"एक सूरज आसमान पर चढ़ता है, आम सूरज, सारी धरती के लिए, साझे का सूरज, जिसकी रौशनी से धरती पर सब कुछ दिखाई देता है, जिसकी तपिश से सब कुछ जीता है, जन्मता है, और फलता है. लेकिन एक सूरज धरती पर भी उगता है, खास सूरज, एक मन की धरती के लिए. सिर्फ एक मन के लिए, सारे का सारा. इससे एक बात एक रिश्ता बन जाती है, एक ख्याल-एक कृति, और एक सपना-एक हकीकत. इस सूरज का रूप इंसान का होता है. इंसान के कई रूपों की तरह इसके भी कई रूप हो सकते हैं. आम तौर पर यह सूरज एक ही धरती के लिए होता है, लेकिन कभी-कभी आसमान के सूरज की तरह आम भी हो जाता है-सबके लिए-जब यह देवता, गुरु या पैगम्बर के रूप में आता है.
मैंने इस सूरज को पहली बार एक लेखिका के रूप में देखा था, एक शायरा के रूप में. किस्मत कह लो या संजोग, मैंने इसे ढूंढकर अपना लिया- एक औरत के रूप में, एक दोस्त के रूप में, एक आर्टिस्ट के रूप में, और एक महबूबा के रूप में."
- इमरोज़
आज से पैंतालीस साल पहले अमृता-इमरोज़ ने समाज को धता बताकर साथ रहने का फैसला कर लिया था. यह दस्तावेज़ है उनकी ज़ुबानी उनकी कहानी का.
और आज, 7 अप्रैल, 2010 की दोपहर, एक बेहद प्यारे दोस्त ने इन दोनों की साझी जीवनी, 30 किलोमीटर दूर से, मेरी मेज़ तक पहुंचाई, मेरे और मेरे प्यार के नाम :)
आज का दिन, अमृता-इमरोज़ के नाम.
-अमृता इमरोज़, लेखिका- उमा त्रिलोक, प्रकाशक-पेंगुइन.
