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Tuesday, May 29, 2007

MERA SAFAR

A few lines...

मै एक गुरेज़ाँ लम्हा हूँ
आयाम के अफ़सून खाने में
मै एक तड़पता कतरा हूँ
मसरूफ़-ऐ-सफर जो रहता है
माज़ी की सुराही के दिल में
मुस्तकबिल के पैमाने में
मै सोता हूँ और जागता हूँ
और जाग के फ़िर सो जाता हूँ
सदियों का पुराना खेल हूँ मै
मै मर के अमर हो जाता हूँ…

-Ali Sardar Zafri