Showing posts with label कैफ़ी आज़मी. Show all posts
Showing posts with label कैफ़ी आज़मी. Show all posts

Monday, September 20, 2010

इन्तिशार

कभी जमूद(1) कभी सिर्फ इन्तिशार(2) सा है
जहाँ को अपनी तबाही का इन्तिज़ार सा है

मनु की मछली, न कश्ती-ए-नूह और यह फिज़ा
के कतरे-कतरे में तूफ़ान बेकरार सा है

मैं किस को अपने गिरेबाँ(3) का चाक दिखलाऊँ
के आज दामन-ए-यजदान(4) भी तार-तार(5) सा है

सजा-संवार के जिसको हज़ार नाज़ किये
उसी पे ख़ालिक-ए-कोनैन(6) शर्मसार सा है

तमाम जिस्म है बेदार(7) फ़िक्र-ए-ख्वाबीदा(8)
दिमाग़ पिछले ज़माने की यादगार सा है

सब अपने पाँव पे रख रख के पाँव चलते हैं
खुद अपने दोश(9) ये हर आदमी सवार सा है

जिसे पुकारिए मिलता है इक खंडर से जवाब
जिसे भी देखिये माज़ी(10) का इश्तेहार सा है

हुयी तो कैसे बयाबाँ(11) में आके शाम हुयी
के जो मज़ार(12) यहाँ है मेरा मज़ार सा है

कोई तो सूद चुकाए, कोई तो ज़िम्मा ले
उस इन्किलाब का जो आज तक उधार सा है

- कैफ़ी आज़मी

1. जमा हुआ 2. बिखरा हुआ 3. गला 4. इश्वर का दामन 5. छिन्न-भिन्न 6. इश्वर 7. जागृत 8. चिंता युक्त नींद 9. कन्धा 10. भूतकाल 11. जंगल, वीराना 12. समाधी



'सरमाया', कैफ़ी आज़मी: समग्र
वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली