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Sunday, October 30, 2011

बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे/ खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे


बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे
खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे


किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला
कटा ज़िन्दगी का सफ़र धीरे-धीरे


जहाँ आप पहुंचे छलांगे लगा कर
वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे-धीरे


पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी
उठाता गया यों ही सर धीरे-धीरे


गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया
गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे


-रामदरश मिश्र


श्लाका सम्मान से विभूषित, हिंदी के वरिष्ठ कवि श्री रामदरश मिश्र के 13 काव्य संग्रह, 12  उपन्यास, 14  कहानी संग्रह, एवं कई ललित निबंध संग्रह, यात्रा वर्णन, संस्मरण, आलोचना आदि प्रकाशित हो चुके हैं.

Monday, July 11, 2011

दुनिया जिसे कहते हैं बच्चे का खिलौना है

दुनिया जिसे कहते हैं बच्चे का खिलौना है
मिल जाये तो मिटटी है, खो जाये तो सोना है

अच्छा-सा कोई मौसम, तनहा-सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है

बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है

गम हो की ख़ुशी दोनों कुछ दूर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है, हँसना है न रोना है

ये वक़्त जो तेरा है ये वक़्त जो मेरा है
हर गाम पे पहरा है, फिर भी इसे खोना है

आवारामिज़ाजी ने फैला दिया आँगन को
आकाश की चादर है धरती का बिछोना है

-निदा फाज़ली

Monday, February 28, 2011

अपना ग़म भूल गए तेरी जफ़ा भूल गए


अपना ग़म भूल गए तेरी जफ़ा भूल गए
हम तो हर बात मोहब्बत के सिवा भूल गए

हम अकेले ही नहीं प्यार के दीवाने सनम
आप भी नज़रें झुकाने की अदा भूल गए

अब तो सोचा है के दामन ही तेरा थामेंगे
हाथ जब हमने उठाये हैं दुआ भूल गए

शुक्र समझो या इसे अपनी शिकायत समझो
तुमने वो दर्द दिया है के दवा भूल गए

Thursday, February 17, 2011

अभी इस तरफ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें संवार लूँ


अभी इस तरफ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें संवार लूँ
मेरा लफ्ज़ लफ्ज़ हो आईना तुझे आईने में उतार लूँ

मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब् का जगा हुआ
ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ

अगर आसमान की नुमाइशों में मुझे भी इज़्न-ए-कयाम हो
तो मैं मोतियों की दूकान से तेरी बालियाँ तेरे हार लूँ

[इज़्न-ए-कायम= command to stop]

कई अजनबी तेरी राह के मेरे पास से यूं गुज़र गए
जिन्हें देख कर ये तड़प हुई तेरा नाम ले के पुकार लूँ

-बशीर बद्र

Tuesday, December 07, 2010

जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे, हज़ारों तरफ से निशाने लगे

जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे
हज़ारों तरफ से निशाने लगे

हुई शाम यादों के इक गाँव में
परिंदे उदासी के आने लगे

घड़ी दो घड़ी मुझको पलकों पे रख
यहाँ आते आते ज़माने लगे

कभी बस्तियां दिल की यूँ भी बसीं
दुकाने खुलीं, कारखाने लगे

वहीँ ज़र्द पत्तों का कालीन है
गुलों के जहाँ शामियाने लगे

पढाई लिखाई का मौसम कहाँ
किताबों में ख़त आने-जाने लगे

-बशीर बद्र

Monday, September 20, 2010

इन्तिशार

कभी जमूद(1) कभी सिर्फ इन्तिशार(2) सा है
जहाँ को अपनी तबाही का इन्तिज़ार सा है

मनु की मछली, न कश्ती-ए-नूह और यह फिज़ा
के कतरे-कतरे में तूफ़ान बेकरार सा है

मैं किस को अपने गिरेबाँ(3) का चाक दिखलाऊँ
के आज दामन-ए-यजदान(4) भी तार-तार(5) सा है

सजा-संवार के जिसको हज़ार नाज़ किये
उसी पे ख़ालिक-ए-कोनैन(6) शर्मसार सा है

तमाम जिस्म है बेदार(7) फ़िक्र-ए-ख्वाबीदा(8)
दिमाग़ पिछले ज़माने की यादगार सा है

सब अपने पाँव पे रख रख के पाँव चलते हैं
खुद अपने दोश(9) ये हर आदमी सवार सा है

जिसे पुकारिए मिलता है इक खंडर से जवाब
जिसे भी देखिये माज़ी(10) का इश्तेहार सा है

हुयी तो कैसे बयाबाँ(11) में आके शाम हुयी
के जो मज़ार(12) यहाँ है मेरा मज़ार सा है

कोई तो सूद चुकाए, कोई तो ज़िम्मा ले
उस इन्किलाब का जो आज तक उधार सा है

- कैफ़ी आज़मी

1. जमा हुआ 2. बिखरा हुआ 3. गला 4. इश्वर का दामन 5. छिन्न-भिन्न 6. इश्वर 7. जागृत 8. चिंता युक्त नींद 9. कन्धा 10. भूतकाल 11. जंगल, वीराना 12. समाधी



'सरमाया', कैफ़ी आज़मी: समग्र
वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली

Monday, March 22, 2010

Tum Baithe ho



तुम बैठे हो, लेकिन जाते देख रहा हूँ,
मैं तनहाई के दिन आते देख रहा हूँ...


आने वाले लम्हे से दिल सहमा है,
तुमको भी डरते घबराते देख रहा हूँ।


कब यादों का ज़ख्म भरे, कब दाग मिटे,
कितने दिन लगते हैं भुलाते देख रहा हूँ॥ :-)


उसकी आँखों में भी काजल फैला है,
मैं भी मुढ के जाते जाते देख रहा हूँ॥


- जावेद अख्तर 
the sheer simplicity of this gazal is amazing. written by Javed Sa'b and sung by Jagjit ji. the third 'sher' is my favorite. and yours?