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Monday, July 11, 2011

दुनिया जिसे कहते हैं बच्चे का खिलौना है

दुनिया जिसे कहते हैं बच्चे का खिलौना है
मिल जाये तो मिटटी है, खो जाये तो सोना है

अच्छा-सा कोई मौसम, तनहा-सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है

बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है

गम हो की ख़ुशी दोनों कुछ दूर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है, हँसना है न रोना है

ये वक़्त जो तेरा है ये वक़्त जो मेरा है
हर गाम पे पहरा है, फिर भी इसे खोना है

आवारामिज़ाजी ने फैला दिया आँगन को
आकाश की चादर है धरती का बिछोना है

-निदा फाज़ली

Monday, September 15, 2008

मुझी में खुदा था

मुझे याद है
मेरी बस्ती के सब पेड़
पर्वत
हवाएं
परिंदे
मेरे साथ रोते थे
हँसते थे

मेरे ही दुःख में
दरिया किनारों पे सर को पटकते थे

मेरी ही खुशियों में
फूलों पे
शबनम के मोती चमकते थे

यहीं
सात तारों के झुरमुट में
लाशक्ल सी
जो खुनक रौशनी थी

वही जुगनुओं की
चरागों की
बिल्ली की आँखों की ताबंदगी थी

नदी मेरे अन्दर से होके गुजरती थी
आकाश!
आँखों का धोका नही था

ये बात उन दिनों की है
जब इस ज़मीन पर
इबादत घरों की जरूरत नही थी
मुझी में
खुदा था!

from the collection, khoya huya sa kuch,
published by vani prakashan