दुनिया जिसे कहते हैं बच्चे का खिलौना है
मिल जाये तो मिटटी है, खो जाये तो सोना है
अच्छा-सा कोई मौसम, तनहा-सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है
गम हो की ख़ुशी दोनों कुछ दूर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है, हँसना है न रोना है
ये वक़्त जो तेरा है ये वक़्त जो मेरा है
हर गाम पे पहरा है, फिर भी इसे खोना है
आवारामिज़ाजी ने फैला दिया आँगन को
आकाश की चादर है धरती का बिछोना है
-निदा फाज़ली
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Monday, July 11, 2011
Monday, September 15, 2008
मुझी में खुदा था
मुझे याद है
मेरी बस्ती के सब पेड़
पर्वत
हवाएं
परिंदे
मेरे साथ रोते थे
हँसते थे
मेरे ही दुःख में
दरिया किनारों पे सर को पटकते थे
मेरी ही खुशियों में
फूलों पे
शबनम के मोती चमकते थे
यहीं
सात तारों के झुरमुट में
लाशक्ल सी
जो खुनक रौशनी थी
वही जुगनुओं की
चरागों की
बिल्ली की आँखों की ताबंदगी थी
नदी मेरे अन्दर से होके गुजरती थी
आकाश!
आँखों का धोका नही था
ये बात उन दिनों की है
जब इस ज़मीन पर
इबादत घरों की जरूरत नही थी
मुझी में
खुदा था!
मेरी बस्ती के सब पेड़
पर्वत
हवाएं
परिंदे
मेरे साथ रोते थे
हँसते थे
मेरे ही दुःख में
दरिया किनारों पे सर को पटकते थे
मेरी ही खुशियों में
फूलों पे
शबनम के मोती चमकते थे
यहीं
सात तारों के झुरमुट में
लाशक्ल सी
जो खुनक रौशनी थी
वही जुगनुओं की
चरागों की
बिल्ली की आँखों की ताबंदगी थी
नदी मेरे अन्दर से होके गुजरती थी
आकाश!
आँखों का धोका नही था
ये बात उन दिनों की है
जब इस ज़मीन पर
इबादत घरों की जरूरत नही थी
मुझी में
खुदा था!
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published by vani prakashan
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