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Saturday, November 12, 2011

अजनबी शहर नहीं है कोई


अजनबी शहर नहीं है कोई
कौन-सा शहर है वो
जिसमें कभी
चाँद निकला न हो दिलदारी का
ज़िक्र होता ही न हो, जिसके मसीहाओं में,
दिल के बीमारों का या इश्क की बीमारी का

अजनबी शहर नहीं है कोई
कौन-सा शहर है वो जिसके गली-कूचों की दीवारों पर
कोई अफ़साना लिखा ही न गया हो अब तक
जिसके बाज़ारों से सेहरा की तरफ़
कोई अपने से जुदा ही न गया हो अब तक

अजनबी शहर नहीं है कोई
कौन-सा शहर है वो जिसने कभी
अपने तरह-दारों को,
कज-कुलह वालों को,
फनकारों को
फूल की तरह सजाया न हो गुलदानों में
शमा की तरह जलाया न हो बेहोश तरब-खानों3 में
मय की मानिंद उड़ेला न हो पैमानों में
और गिराया न हो पैमानों से

अजनबी शहर नहीं है कोई
कौन-सा शहर है वो
जिसने कभी
अपने दीवानों के कँधों पे सजाई न सलीब

अजनबी शहर नहीं है कोई
शाम जिस शहर में हो
हम उसी शहर के हों
और काँधों पे सलीबों की जो तहरीरें हैं
शहरियत के वही परवाने नहीं
अपने अफ़साने उसी शहर के अफ़साने नहीं
हम उसी शहर के दीवाने बनें
अजनबी शहर नहीं है कोई

-राही मासूम रज़ा, ‘ग़रीबे-शहर’

Thursday, September 17, 2009

मर्सिया

एक चुटकी नींद की मिलती नहीं
अपने जख्मों पर छिड़कने के लिए
हाय, हम किस शहर में मारे गए

घंटियाँ बजती हैं,
ज़ीने पर कदम की चाप है
फिर कोई बेचेहरा होगा
मुहँ में होगी जिसके मक्खन की जुबां
सीने में होगा जिसके एक पत्थर का दिल
मुस्कुराकर मेरे दिल का इक वरक ले जाएगा

(बम्बई, २२-०५-१९७०)

- राही मासूम रज़ा

these days i'm deeply into the poetry of Shri Rahi Masoom Raza. bought a collection of his poetry, titled "Gareebe-shehar" from the Delhi Book Fair this time. it is the first poem in the collection and i've not read more than five of them till now. just been reading them again and again. will be posting the second one soon.