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Wednesday, November 16, 2011
Thursday, February 17, 2011
अभी इस तरफ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें संवार लूँ
अभी इस तरफ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें संवार लूँ
मेरा लफ्ज़ लफ्ज़ हो आईना तुझे आईने में उतार लूँ
मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब् का जगा हुआ
ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ
अगर आसमान की नुमाइशों में मुझे भी इज़्न-ए-कयाम हो
तो मैं मोतियों की दूकान से तेरी बालियाँ तेरे हार लूँ
[इज़्न-ए-कायम= command to stop]
कई अजनबी तेरी राह के मेरे पास से यूं गुज़र गए
जिन्हें देख कर ये तड़प हुई तेरा नाम ले के पुकार लूँ
-बशीर बद्र
Tuesday, December 07, 2010
जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे, हज़ारों तरफ से निशाने लगे
जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे
हज़ारों तरफ से निशाने लगे
हुई शाम यादों के इक गाँव में
परिंदे उदासी के आने लगे
घड़ी दो घड़ी मुझको पलकों पे रख
यहाँ आते आते ज़माने लगे
कभी बस्तियां दिल की यूँ भी बसीं
दुकाने खुलीं, कारखाने लगे
वहीँ ज़र्द पत्तों का कालीन है
गुलों के जहाँ शामियाने लगे
पढाई लिखाई का मौसम कहाँ
किताबों में ख़त आने-जाने लगे
हज़ारों तरफ से निशाने लगे
हुई शाम यादों के इक गाँव में
परिंदे उदासी के आने लगे
घड़ी दो घड़ी मुझको पलकों पे रख
यहाँ आते आते ज़माने लगे
कभी बस्तियां दिल की यूँ भी बसीं
दुकाने खुलीं, कारखाने लगे
वहीँ ज़र्द पत्तों का कालीन है
गुलों के जहाँ शामियाने लगे
पढाई लिखाई का मौसम कहाँ
किताबों में ख़त आने-जाने लगे
-बशीर बद्र
Monday, March 15, 2010
woh nahi hai to uski aas rahe
वोह नहीं है तो उसकी आस रहे
एक जाये तो एक पास रहे
जब भी कसने लगा, उतार दिया
इस बदन पर कई लिबास रहे
दोनों एक दुसरे का मूंह देखें
आइना आईने के पास रहे
आज हम सब के साथ खूब हंसें
और फिर देर तक उदास रहे
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