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Saturday, November 12, 2011

अजनबी शहर नहीं है कोई


अजनबी शहर नहीं है कोई
कौन-सा शहर है वो
जिसमें कभी
चाँद निकला न हो दिलदारी का
ज़िक्र होता ही न हो, जिसके मसीहाओं में,
दिल के बीमारों का या इश्क की बीमारी का

अजनबी शहर नहीं है कोई
कौन-सा शहर है वो जिसके गली-कूचों की दीवारों पर
कोई अफ़साना लिखा ही न गया हो अब तक
जिसके बाज़ारों से सेहरा की तरफ़
कोई अपने से जुदा ही न गया हो अब तक

अजनबी शहर नहीं है कोई
कौन-सा शहर है वो जिसने कभी
अपने तरह-दारों को,
कज-कुलह वालों को,
फनकारों को
फूल की तरह सजाया न हो गुलदानों में
शमा की तरह जलाया न हो बेहोश तरब-खानों3 में
मय की मानिंद उड़ेला न हो पैमानों में
और गिराया न हो पैमानों से

अजनबी शहर नहीं है कोई
कौन-सा शहर है वो
जिसने कभी
अपने दीवानों के कँधों पे सजाई न सलीब

अजनबी शहर नहीं है कोई
शाम जिस शहर में हो
हम उसी शहर के हों
और काँधों पे सलीबों की जो तहरीरें हैं
शहरियत के वही परवाने नहीं
अपने अफ़साने उसी शहर के अफ़साने नहीं
हम उसी शहर के दीवाने बनें
अजनबी शहर नहीं है कोई

-राही मासूम रज़ा, ‘ग़रीबे-शहर’

Monday, November 07, 2011

क़ुरान हाथों में ले के/ Kuraan hathon mein le ke -गुलज़ार/Gulzar


क़ुरान हाथों में ले के नाबीना एक नमाज़ी
लबों पे रखता था, दोनों आँखों से चूमता था
झुका के पेशानी यूं अकीद्त से छू रहा था
जो आयतें पढ़ नहीं सकता, उनके लम्स महसूस कर रहा हो
मैं हैराँ-हैराँ गुज़र गया था
मैं हैराँ-हैराँ ठहर गया हूँ

तुम्हारे हाथों को चूम कर, छूके अपनी आँखों से आज मैंने
जो आयतें पढ़ नहीं सका, उनके लम्स महसूस कर लिए हैं

-गुलज़ार


Kuraan hathon mein le ke nabeena ek namazi
Labon pe rakhta tha, dono aankhon se choomta tha
Jhuka ke peshani yoon akeedat se choo raha tha
Jo aayatein padh nahi sakta, unke lams mehsoos kar raha ho
Main hairan-hairan guzar gaya tha
Main hairan-hairan thehar gaya hoon

Tumhare hathon ko choom kar, chooke apni aankhon se aaj maine
Jo aayatein padh nahi saka, unke lams mehsoos kar liye hain

-Gulzar

when you begin your day with Gulzar, it can take you to places you never imagined existed within yourself.

Sunday, October 30, 2011

बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे/ खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे


बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे
खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे


किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला
कटा ज़िन्दगी का सफ़र धीरे-धीरे


जहाँ आप पहुंचे छलांगे लगा कर
वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे-धीरे


पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी
उठाता गया यों ही सर धीरे-धीरे


गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया
गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे


-रामदरश मिश्र


श्लाका सम्मान से विभूषित, हिंदी के वरिष्ठ कवि श्री रामदरश मिश्र के 13 काव्य संग्रह, 12  उपन्यास, 14  कहानी संग्रह, एवं कई ललित निबंध संग्रह, यात्रा वर्णन, संस्मरण, आलोचना आदि प्रकाशित हो चुके हैं.

Monday, July 11, 2011

दुनिया जिसे कहते हैं बच्चे का खिलौना है

दुनिया जिसे कहते हैं बच्चे का खिलौना है
मिल जाये तो मिटटी है, खो जाये तो सोना है

अच्छा-सा कोई मौसम, तनहा-सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है

बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है

गम हो की ख़ुशी दोनों कुछ दूर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है, हँसना है न रोना है

ये वक़्त जो तेरा है ये वक़्त जो मेरा है
हर गाम पे पहरा है, फिर भी इसे खोना है

आवारामिज़ाजी ने फैला दिया आँगन को
आकाश की चादर है धरती का बिछोना है

-निदा फाज़ली