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Friday, December 04, 2009

जो तू हँसी है तो हर एक अधर पे रहना सीख

जो तू हँसी है तो हर एक अधर पे रहना सीख
अगर है अश्क तो औरों के गम में बहना सीख

अगर है हादसा तो दिल से दूर-दूर ही रह
अगर है दिल तो सभी हादसों को सहना सीख

अगर तू कान है तो झूठ के करीब न जा
अगर तू होंठ है तो सच बात को ही कहना सीख

अगर तू फूल है तो खिल सभी के आँगन में
अगर तू ज़ुल्म की दीवार है तो ढहना सीख

अहम् नही है तो आ तू 'कुंवर' के साथ में चल
अहम् अगर है तो फिर अपने घर में रहना सीख

- कुंवर बेचैन
(आँधियों धीरे चलो)

काफ़ी समय से कुंवर बेचैन को पढ़ना चाहता था। और इस बार साहित्य अकादेमी लाइब्रेरी में ये गजलों का संग्रह मिला तो रोक नही पाया ख़ुद को इसे इश्यु कराने से! एक और भी किताब लाया हूँ, अज्ञेय की संपूर्ण कहानियाँ। पता नही कब पढ़ पाऊँगा। कुछ अच्छा मिला तो ज़रूर यहाँ पोस्ट करूंगा।
अच्छा लगता है जब आप सब इस ब्लॉग पर आकर ये सब पढ़ते हैं और अपने विचार लिखते हैं। शुक्रिया :)

-आदि

Thursday, April 30, 2009

मापदंड बदलो

मेरी प्रगत या अगति का
यह मापदंड बदलो तुम,
जुए के पत्ते सा
मैं अभी अनिश्चित हूँ
मुझ पर हर और से चोटें पड़ रही हैं,
कोंपलें उग रही हैं,
पत्तियां झाड़ रही हैं,
मैं नया बनने के लिए खराद पर चढ़ रहा हूँ,
लड़ता हुआ
नई राह गढ़ता हुआ आगे बढ़ रहा हूँ

अगर इस लड़ाई में मेरी साँसे उखड गयीं,
मेरे बाजु टूट गए,
मेरे चरणों में आंधियों के समूह ठहर गए,
मेरे अधरों पर तरंगाकुल संगीत जम गया,
या मेरे माथे पर शर्म की लकीरें खिंच गयीं,
तो मुझे पराजित मत मानना,
समझना-
तब और भी बड़े पैमाने पर,
मेरे ह्रदय में असंतोष उबल रहा होगा,
मेरे उम्मीदों के सैनिकों के पराजित पंक्तियाँ
एक बार और
शक्ति आजमाने को
धूल में खो जाने को या कुछ हो जाने को
मचल रही होंगी
एक और अवसर की प्रतीक्षा में
मन् की कंदीलें जल रही होंगी

ये जो चाँद से फफोले तलुओं में दिख रहे हैं
ये मुझको उकसाते हैं
पिंडलियों की उभरी हुयी नसें
मुझ पर व्यंग्य करती हैं
मुहँ पर पड़ी हुई यौवन की झुर्रियां
कसम देती हैं
कुछ हो अब, तय है-
मुझको आशंकाओं पर काबू पाना है,
पत्थरों के सीने में
प्रतिध्वनि जागते हुए
परिचित उन राहों में एक बार
विजय-गीत गाते हुए जाना है-
जिनमें मैं हार चुका हूँ

मेरी प्रगति या अगति का
यह मापदंड बदलो तुम
मैं अभी अनिश्चित हूँ.